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Sunday, 7 April 2013

अवघड - सच्चाई

                                  अवघड-सच्चाई
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कभी किसी चौखट पर आशियाने की ख़्वाहिश पनपी ; पर वहाँ सामाजिक प्रपंचों के ढेरों ताले जड़े मिले , और मैंने क़दम खींच लिए .....रुकना मुनासिब ना था ......
सफ़र में थक कर , किसी छाँह के सुकून को रुका -- पर फुसफुसाहटों और मुँह दबी फब्तियों  ने बेचैन कर दिया ! चाह कर भी रुक ना सका .......मै फिर बढ़ चला .......तन्हा ........अपनी राह !!
फिर ना जाने क्यूँ , एक छत ने महफ़ूज़ होने का भ्रम दिया ! ना जाने क्यूँ फिर आसरे की चाह जागी ! पर वहां भी शंकाओं और दोहरे मापदंडों की भुरभुरी नींव ने ईमारत ही ढहाने की ठान ली ! कोई ठिकाना ना हुआ !
पर सफ़र रुका नहीं .......अब भी बदस्तूर जारी है ....एक मुस्कुराहट और उन यादों की मीठी टीस के साथ , जिन्हें सिर्फ ख़्वाबों के सहारे जिया , सिर्फ ख़्वाबों में सहेजा , समेटा , और जो सिर्फ ख़्वाब ही रह गये !
अब टिमटिमाते तारों से जड़े नीले आकाश ने , सर पर एक अनंत विस्तार खींच रखा है -----ना तो इसे नींव की दरकार है , और ना ही इसके छीजने, दरकने का भय ! और मैं बेफ़िक्र चल पड़ा हूँ -----भूत , भविष्य से परे ------अवघड सच की  पगडंडियाँ ।
  राजेश पाण्डेय

Monday, 16 April 2012


दीये में जज़्बातों की बाती होती है ! Thomas Elwa Edison के बल्ब से C F L और अब neon lights की चकाचौंध, आँखों की पुतलियों पर सिकुड़ने- फैलने का करिश्मा ही कर सकती हैं -पर दिल तक तो सिर्फ मिट्टी के दीये की लौ ही पहुंचती है !
मेरे लिए दीये का धर्म से कोई रिश्ता नहीं है ! क्योंकि मै उस अबूझे , निराकार और सर्वव्यापी ईश्वर के अतिरिक्त किसी कपोल कल्पना को नहीं मानता ! धर्म के बंटवारे पर भी मेरा यक़ीन नहीं ! पर बचपन से माँ को आस्था का आँचल सर पर खींच कर दमकते दीये के आगे नतमस्तक होते देखा है ; शायद तब से मेरे लिए दीये में ममता का तेल पड़ता है !!

      फिर अकस्मात तुम आयीं ! मेरा हाथ थामकर ,तुलसी चौरे पर जलता दीपक सजा कर , उसकी धीमी आंच पर अपनी हथेली तपाती और बड़े स्नेह से मेरे माथे पर रख देती - मै भी भाव विभोर होकर तेरा माथा चूम लेता ! शायद तब से दीये की टिमटिमाती लौ की मद्धम आँच सर्वांग को छूने की कशिश पालती हैं !
राजेश पाण्डेय